संस्कृति और विरासत

कुकर्रामठ मंदिर

डिंडौरी में राज्य राजमार्ग क्र 22 से महज 7 किलोमीटर दूर स्थित कुकर्रामठ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। भगवान शिव के अन्य मंदिरों के विपरीत, यह एक पश्चिम मुखी मंदिर है। यह पहले एक पांच मंदिरों का एक समूह था, लेकिन अब केवल एक ही शेष है और एक किंवदंती के अनुसार यह मंदिर एक रात में बनाया गया था और जिसका शिखर सुर्यौदय के पहले पूरा नहीं हो सका था। इस मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक के रूप में घोषित किया गया है। इस मंदिर को रिनमुक्तेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

कुकर्रामठ मंदिर

भगवान शिव का मंदिर, कुकर्रामठ

पाटनगढ़ चित्रकला

पाटनगढ़ डिंडौरी में एक छोटा सा गाँव है जो आदिवासी संस्कृति और विरासत को चित्रित करने वाले, विश्व स्तर के चित्रकारों के निर्माण की एक समृद्ध परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यह गोंड जनजाति की एक विशेषता है, जो अपेक्षाकृत एक नया कला रूप है, और इसकी जड़ों का इतिहास में दूर तक पता लगाया जा सकता है। गोंड चित्रकला एक छिपा हुआ खजाना है जो पीढ़ी दर पीढ़ी पाटनगढ़ में आगे बढाया गया है। ज्यादातर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाले, गोंड जनजाति, सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक है। किंवदंती है कि युगों पहले प्रधानों (पुजारी और कहानीकार) और गोंड जनजाति के बीच एक सुंदर प्रतीकात्मक संबंध था। प्रधान एक संगीत वाद्य यंत्र ‘बाना’ के माध्यम से भगवान बाबा देव की आराधना करते थे; जिससे की वह गोंड संरक्षकों की वंशावली को अमर बनाएं। हालांकि, समय और सामाजिक परिवर्तनों ने आज गोंडों और प्रधानों के बीच संबंधों को प्रभावित किया है, और आज वह इतिहास की अपनी कला में उतारने के बजाय किसानी जैसे अल्पकालिक कार्य करते हुए पाये जाते हैं।

पाटनगढ़ चित्रकला

गोंड चित्रकला

धातु शिल्प एवं बांस कला
अयस्क से लौह निष्कर्षण और लोहे से उत्पाद बनाने की कला अभी भी डिंडौरी में प्रचलित है। जब गढ़ा लोहे से बनी कलाकृतियों की बात आती है, आदिवासी लोगों की गुणवत्ता, शुद्धता और कौशल अपने सबसे अच्छे रूप में है।

धातु कला

आदिवासी लोगों द्वारा बने बांस के उत्पादों का उपयोग कई पांच सितारा होटलों और कई घरों में आंतरिक सजावट के लिए किया जा रहा है। डिंडौरी के बांस कला कार्य को धीरे-धीरे पहचान मिल रही है, यह सराहनीय है।

बांस कला

   
 
 
 
 
 
 
 
 

लोक नृत्य
इस क्षेत्र में कई लोक नृत्य किए जाते हैं। बैगा और गोंड जनजातियों को नृत्य और संगीत का शौकीन माना जाता है। उनके लिए संगीत ईश्वर की देन है। उनके नृत्यों को दो श्रेणियों अर्थात् सामाजिक और धार्मिक नृत्यों में विभाजित किया गया है। धार्मिक नृत्यों को भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने, बाढ़, अकाल और महामारी जैसी बुराइयों के कारण होने वाली समस्या से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है।

लोक नृत्य
धार्मिक नृत्यों में सुआ, दशेरा, दोहा और सुमरन हैं जबकि सामाजिक नृत्यों में करमा, रीना, सैला, बिलमा, झारपड़ और तापडी जनजातियों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।

आयुर्वेद औषधि
डिंडौरी, अचनकमार अमरकंटक जीवमंडल रिज़र्व क्षेत्र में आता है जिसमें जैव-विविधता है। चिकित्सा पर्यटन बढ़ रहा है क्योंकि कई लोग यहाँ के औषधीय जड़ी बूटियों के पारंपरिक ज्ञान का सहारा ले रहे हैं जो कि विभिन्न बीमारियों को ठीक करने के लिए आदिवासियों द्वारा उपयोग किया जाता है।

आयुर्वेद